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Friday, December 29, 2017



स्वास्थ्य और व्ययाम

स्वस्थ तन-मन के बिना जीवन बोझ – जीवन एक आनंद है | इस आनंद का अनुभव वाही कर सकता है, जिसका तन और मन दोनों स्वस्थ हो तो मन स्वयं स्वस्थ रहता है | अगर तन-मन स्वस्थ न हों तो जीवन में कोई रन नहीं रहता | ऐसा जीवन व्यर्थ का बोझ बन जाता है |

अच्छे स्वास्थ्य के लिए अपेक्षित कार्यक्रम – अच्छे स्वास्थ्य के लिए तन और मन दोनों का व्ययाम अपेक्षित है | तन के व्यायाम के लिए चाहिए खेल-कूद, योगासन आदि | मन के व्यायाम के लिए अपेक्षित है अच्छे सहिस्य का पठन-पाठन और सत्संगति | अच्छे विचारों और भावों के संपर्क में रहने से मन का व्यायाम होता है |

शरीरिक स्वास्थ्य और व्यायाम – शरीरक स्वास्थ्य का अर्थ है – शरीर को निरोग और सुद्रढ़ बनाना | जब शरीर में कोई बीमारी नहीं होती तो वह ठीक अपने स्वाभाविक स्वरूप में होता है | इसके लिए नित्य व्यायाम करना आवयशक है | व्यायाम करने के अनेक ढंग हो सकते हैं | कबड्डी, खो-खो, हॉकी, फुटबाल, क्रिकेट, बैडमिंटन, टेबल टेनिस आदि मान्यता-प्राप्त खेल हैं | कुश्ती, जुडो-कराटे, मलखंभ, तैराकी अन्य प्रकार के खेल हैं | कुछ खेल गली-मोहल्लों में खेले जाते हैं, जैसा लुका-छिपी, पिट्ठू बनाना आदि | ये सब खेल शरीर को क्रियाशील रखने के ही प्रकार हैं | प्राय: लडकियाँ रस्सी कूदना जैसा व्यायाम में रूचि लेती हैं |

उपर्युक्त शरीरिक क्रियाओं से शरीर के सभी मल दूर हो जाते हैं | पसीना निकलता है | खून का दौरा तीव्र होता है | त्वचा के सभी बंद रंध्र खुल जाते हैं | शरीर हल्का प्रतीत होने लगता है |उसमें रोगों से लड़ने को शक्ति बढ़ जाति है |

मानसिक स्वास्थ्य और व्यायाम – मन को स्वस्थ रखने का आशय है – अपने प्रेम, उत्साह, करुणा आदि भावों को स्वाभाविक बनाए रखना | उन्हें घ्रणा, द्वेष या निंदा में न फँसने देना | इसके लिए सत्साहित्य पढ़ना चाहिए | महापुरुषों की जीवनियाँ पढ़नी चाहिए | शरीरिक रूप से स्वस्थ रहने पर मन भी अपने स्वाभाविक रूप में बना रहता है | अतः शरीरिक व्यायाम मन को शक्ति प्रदान करते हैं |

स्वास्थ व्यक्ति से स्वस्थ समाज का निर्माण – जिस समाज के व्यक्ति स्वस्थ होते हैं, वह समाज भी स्वस्थ बनता है | एसा समाज बुराइयों से लड़ पाता है, अन्याय का विरोध कर पाता है | ऐसा समाज ही प्रेम और करुणा का परिचय दे पाता है | यही कारण है कि अस्वस्थ शरीर वाले नगरीय समाज में चोरी और गुंडागर्दी की घटनाएँ अधिक होती हैं | गाँव के स्वस्थ लोग गाँव में घुसे शत्रुओं का एकजुट होकर मुकाबला करते हैं |


Sunday, December 18, 2016


किसी फिल्म की समीक्षा 
‘चक दे इंडिया’ की कहानी – कल ही मुझे ‘चक दे इंडिया’ फिल्म देखने का सुअवसर मिला | इसमें मुख्य भूमिका शाहरुख खान ने निभाई है | इसकी कहानी खेल-राजनीति, खेल-भावना, सांप्रदायिक तनाव और जनता की लचर प्रतिक्रिया पर प्रश्नचिह खड़े करती है | फिल्म की कहानी इस प्रकार है – 
नायक शाहरुख खान भारतीय हॉकी टीम का कप्तान है | वह मुसलमान पठान है | पाकिस्तान के साथ खेलते हुए उसकी टीम 0-1 से पिछड़ रही है कि तभी भारतीय तेम को पैनल्टी स्ट्रोक का सुनहरा मौका मिलता है | कप्तान खान अधिक उत्साह और सावधानी में खुद स्ट्रोक लगाता है | दुर्भाग्य से निशाना चुकता है और भारत 1-0 से हार जाता है | मीडिया इस घटना को षड्यंत्र बनाकर पेश करता है | परिणामस्वरूप देश की जनता भड़क जाती है | देश भर में उपद्रव हो जाते हैं | खान के परिवार और मकान को उजाड़ डाला जाता है | वह रातोंरात गद्दार कहलाने लगता है तथा कहीं गुमनामी में खो जाता है |
सात साल बाद वह भारत की नौसिखिया महिला हॉकी टीम का कोच बनकर सामने आता है | वह देखता है कि सभी खिलाड़ने अलग-अलग प्रांतों से हैं | उनकी भाषा, आदतें और भावनाएँ भी भिन्न हैं | वह बड़ी युक्ति से उनमें भारतीयता की भावना भरता है तथा उनमें कठोर अनुशासन लाने का प्रयास करता है | टीम की सभी खिलाड़ने चिढ़ जाती हैं | उनमें आपस में भी झगड़े हो जाते हैं | वे सभी खान को कोच-पद से हटाने के लिए आवेदन कर देती हैं | खान विदाई में सबको होटल में पार्टी देता है | वहीँ एक यवक द्वारा पंजाबी खिलाड़िन को छेड़ने पर पंजाबी खिलाड़िन उसे पीट देती है | होटल में हंगामा हो जाता है | कई युवक लड़कियों की ओर झपटते हैं तो सारी टीम मिलकर युवकों को पीट डालती है | इस प्रकार उनमें एकता सुदृढ़ हो जाती है |
इस बीच हॉकी क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड तथा उनके प्रायोजक भी अड़ंगे डालते हैं | उन्हें हॉकी टीम की योग्यता पर भरोसा नहीं होता | परंतु खान उन युवतियों का मैच परुष हॉकी टीम के साथ करा देते हैं | उस मैच में लड़कियों का खेल देखकर सभी उत्साहित हो जाते हैं | वर्ल्ड कप में भारतीय टीम महला मैच 7-1 से हार जाती है | उसके बाद जीत की शुरुआत होती है जो अंत में वर्ल्ड कप जीतने तक चलती रहती है | भारत का व्ही मीडिया अब खान की पशंसा के पुल बाँध देता है |
प्रभाव,दृश्य, पात्र, सवांद – यह फिल्म पूरी तरह रोमांचक और प्रभावशाली है | इसमें हिंसा, प्रतिक्रोध, खीझ, संघर्ष, साहस, एकता, उत्साह, हार-जीत के प्रभावशाली दृश्य फिल्माए गए हैं | शाहरुख खान का व्यक्तित्व बहुत प्रभावी एवं संवेदनक्षम बन पड़ा है | लड़कियों के हाव-भाव में प्रांतीयता की तुनक, चहक और महक भरपूर है | संवाद दिल को छूने वाले हैं |
जीवन की वास्तविकता – यह फिल्म पूरी तरह यथार्थ है | मीडिया कैसे बेतुकी ख़बरों को उछालता है | जनता किस प्रकार अंधा गुस्सा और प्यार दिखाती है | खेल-राजनीति किस प्रकार गिरगिट की तरह रंग बदलती है | खिलाड़ियों में किस प्रकार प्रांतीय उन्माद पैदा होता है | कोच किन कठिनाईयों, तनावों और अपमानों का घूँट पीकर टीम-भावना को बनाए रखता है | टीम किस प्रकार हार-जीत के साथ डूबती-उतारती है – इसका फिल्मांकन बहुत कुशलता से हुआ है |
प्रेरणा – इस फिल्म से हमें प्रेरणा मिलती है कि हम खिलाड़ियों के साथ सहानुभूति से व्यव्हार करें | अपनी सांप्रदायिक भावनाओं को उस पर न लादें | मीडिया जिम्मेदार बने | सबसे बढ़कर हम राष्ट्रिय एकता का व्यव्हार करें, प्रांतीयता का नहीं |



किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का वर्णन
कार्यक्रम के आयोजक – होली के अवसर पर मेरे नगर की संस्था संस्कार भारती ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया | मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध उद्योगता एंवं समाजसेवी श्री राकेश अग्रवाल को आमंत्रित किया गया था | कार्यक्रम में नगर के दो हज़ार लोग आमंत्रित थे | सभा-भवन रोशनी तथा रंग-बिरंगी झालरों से सुशोभित था | दीप-प्रज्वलन के बाद संस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुआ |
सरस्वती की आराधना – सबसे पहले नगर की नवोदित गायिकाओं ने सस्वती की आराधना में एक मनोरस गीत प्रस्तुत किया-वीणावादिनी वर दे | इस गीत के साथ-साथ पाँच नर्तकियों ने थिरकन-भरा स्तुति-नृत्य प्रस्तुत किया | मधुर आवाज़ के साथ कुशल भाव-भंगिमाओं के योग ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया |
नृत्य के मनमोहक कर्यक्रम – सरस्वती-आराधना के पश्चात् नृत्यों की शुरुआत हुई | पहले एकल लोक-नृत्य प्रस्तुत किया गया | यह नृत्य स्थानीय रंग-ध्वनी को लिए हुआ था | इसके बोल थे – आयो रे आयो रे सावन आयो रे ! इसके पश्चात् 15 स्कूली छात्रों ने हिमाचली नृत्य प्रस्तुत किया | स्कुल की अध्यापिकाएँ विशेष रूप से वहाँ आमंत्रित थीं | इसके पश्चात् पंजाबी गिद्दा और भांगड़ा के कार्यक्रम प्रस्तुत हुए | इनके कारण सभा-भवन में जोश-खरोश भर गया | दर्शकों की नस-नस में मधुर उतेजना भर गई | सब दर्शक तरंगित थे | वे खुलकर तालियाँ बजा रहे थे और मुग्ध हो रहे थे | किसी भी नृत्य के आरंभ और समापन पर ज़ोरदार तालियाँ बजती थी | मंच के संचालक ने भी मीठी-मीठी चुटकियाँ लेकर समाँ बाँध दिया था |
कवितापाठ – इस दिन्बहर से दो विख्यात कवियों को आमंत्रित किया गया था | उनका कवितापाठ हमेशा-हमेशा के लिए मेरे मन में अंकित हो गया | पहले एक गज़लकार और दोहाकार अशोक सुमित्र को बुलाया गया | उन्होंने हिरण्याकश्यप जैसे अहंकारी और दमनकारी लोगों पर व्यंग्य कसते हुए कहा –

मेरे दिलवर यार की बुत जैसी है शान |
अंदर तक पत्थर, मगर, चेहरे पर मुसकान ||
मुझको हँसता देखकर चढ़ता बुखार |
मंगल के दिन भी उसे लगता है शनिवार ||
समारोप – इस गुदगुदाते कवितापाठ के बाद कलाकारों को सम्मानित किया | अंत में रसदार स्वादिष्ट भोजन की व्यवस्था थी | सचमुच यह कार्यक्रम होली जैसा-ही मस्त था | मुझे संस्कार भारती का यह कार्यक्रम भुलाए नहीं भूलेगा |




काल्ह करै सो आज कर 

सूक्ति का स्पष्टीकरण – यह सूक्ति सुख कार्यों के बारे में कही गई है | इसका अर्थ है – सुभ कामों में देर नहीं करनी चाहिए | काम अच्छा हो तो उसे कल पर नहीं छोड़ना चाहिए | उसे तुरंत आरंभ कर देना चाहिए |

सफलता का मंत्र – समय- नियोजन – सफलता-प्राप्ति का मूल मंत्र है – अपने समय का सदुपयोग करना | सदुपयोग का अर्थ है – तुरंत कार्य में लग जाना | जीवन में अनेक दबाव आते हैं | अनके व्यस्तताएँ आती हैं | व्यस्तताओं से अधिक मन का घेरता है – आलस्य और निम्मापन | जो व्यक्ति व्यस्तताओं का बहाना बनाकर या आलस्य में घिरकर सुभ कार्यों को टाल देता है, उसकी सफलता भी टल जाती है | इसके विपरीत, जो मनुष्य सोच-समझकर योजनापूर्वक सुभ कार्यों की और निरंतर कदम बढ़ाता चलता है, एक दिन सफलता उसके चरण चूम लेती है |

टालू-प्रवृति घातक – आज के काम को कल पर डालने की प्रवृति सबसे घटक है | इस प्रवृति के कारण मन में असंतोष बना रहता है | मनुष्य के सर पर अनेक कामों का बोझ बना रहता है | इससे काम को तलने की ऐसी आदत लग जाती कि सुभ कार्य करने की घड़ी आती ही नहीं |

कुछ उदाहरण – जो मनुष्य घर में सफाई करने के काम को टालते रहते हैं, उन्हें गंदगी में रहने की आदत पड़ जाती है | उनका घर हमेशा बिखरा-बिखरा रहता है | उसके घर में जले मिलेंगे, कहीं कोई बटन टुटा हुआ मिलेगा तो कहीं कोई पानी का नल बहता मिलेगा |

सरकारी कार्यालयों का हाल देखिए | जो कर्मचारी आज की फाइल कल पर टाल देता है, उसकी मेज़ पर फाइलों का ढेर लगता चला जाता है | परिणाम यह होता है कि वह उन्हें देख-देखकर चिड़चिड़ा हो उठता है | वह एक भी फाइल नहीं निपटाता | दिल्ली प्रशासन में ऐसे-ऐसे कर्मचारी है जिनकी ज़िंदगी बीत जाती है किंतु उन्हें नौकरी पक्की होने का एक प्रमाण-पत्र तक नहीं मिल पाता |

निष्कर्ष – मनुष्य को चाहिए कि वह आज के काम को आज ही करके सोए | इससे उसे अच्छी नींद आएगी | वरना रात को भी कल के बचे हुए काम के सपने आएँगे जो उसे सोने नहीं देंगे |




दैव-दैव आलसी पुकारा 

आलसी ही दैव (भाग्य)  का सहारा लेता है – भाग्य आलसियों के सहारे जीवित रहता है | जो लोग परिश्रम करने में मन चुराते हैं, वही भाग्य का दामन थामने हैं | परिशमी लोग अपना भाग्य स्वयं बनाते हैं | वे कठोर परिश्रमकरके पाने लिए रोटी, कपड़ा, मकान जुटा लेतें हैं | जबकि आलसी लोग कहते हैं – ‘क्या करें’, हमारी किस्मत में यही बदा था | ’एक प्रसिद्ध कथन है – ‘समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को नहीं मिलता |’ आलसी लोग इस उक्ति का सहारा लेकर बैठ जाते हैं | वे कहते हैं – जब समय आयेगा, भाग्य जागेगा तो साडी चीज़ें अपने-आप मिल जाएँगी | इसलिए वे भूलकर भी परिशाम नहीं करते |
भाग्यवादी निकम्मा होता है – भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाला व्यक्ति निकम्मा होता है | वह हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाता है | उसे भ्रम रहता है कि जो कुछ होगा, किसी और शक्ति के चाहने पर होगा | उसके करने से कुछ नहीं हो सकता | अत: भाग्यवान उसे निकम्मा बना देता है |
विघ्न-बाधायों से डरता है, उसका मुकाबला करने से बचता है – वास्तव में उसे कठोर परिश्रम करने में डर लगता है | भूखा होने पर भी वः सोचता है कि पेड़ पर चढ़कर फल कौन तोड़े, फावड़ा उठाकर मिट्टी कौन खोदे, कौन दिन-भर रेहड़ी पर संतरे बेचता फिरे ! उसकी यही सोच उसे निकम्मा बना देती है | यही सोच उसे मुसीबतों का मुकाबला करने से रोकती है | यदि मनुष्य यह सोच ले कि परिश्रम करने से मुझे रोटी अवश्य मिलेगी, तो वह हँसते-हँसते  फावड़ा चला लेगा, खुसी से पेड़ पर चढ़ जाएगा, उत्साह-पृवक दिन-भर संतरे बेच लेगा और विशाल ज्ञान-राशि को रचा-पचा जाएगा |
निराश, उदासीन और पराश्रित रहता है – भाग्यवादी का दुभाग्य यह है कि वह हमेशा निराश, उदासीन और पराश्रित रहता है | उसे कर्म करने के उत्साह का अनुभव नहीं होता | उसे अपने परिश्रम के प्राप्त फल का सुख नहीं मिल पाता | उसके जीवन में कोई आशा अंकुरित नहीं हो पाती | इसलिए वः सदा भूखा-नंगा, गरीब, निराश और उदासीन रहता है | भूख के मारे उसे औरों से माँगने की आदत पड़ जाती है | इसलिए वह पराश्रित हो जाता है |
परिश्रम सौभाग्य का निर्माता है – सौभाग्य का वास्तविक आधार है – परिश्रम | परिश्रमी व्यक्ति अपना सोया भाग्य जगाकर सौभाग्यशाली बन जाते हैं | वास्तव में संसार में जितने भी निर्माण हुए हैं, वे परिश्रम की ही कहानी कहते हैं | जितनी फसलें उगती हैं, जितने वस्त्र-आभूषण बनते हैं, जितने भवन उद्योग बनते हैं, सब परिश्रम से ही बनते हैं | अत: परिश्रम सौभाग्य का जनक है और आलस्य दुभार्ग्य का | इसलिए कहा गया है – 

जो सोया है, वह कलियुग है |
जो बैठ गया, वह द्वापर है |
जो खड़ा हो गया, त्रेता है |
जो चल पड़ा, वह सतयुग है |

अत: ‘चरैवैति चरैवैति’| चलते रहो, चलते रहो |



यहाँ चाह वहाँ राह
कहावत की भाव, चाह से तात्पर्य – ‘जहाँ चाह, वहाँ, राह’ एक कहावत है | इसका तात्पर्य है – जिसके मन में चाहत (इच्छा) होती है, उसके लिए वहाँ रास्ते अपने-आप बन जाया करते हैं | ‘चाह’ का अर्थ है – कुछ करने या पाने की तीव्र इच्छा |
सफलता के लिए कर्म के प्रति रूचि और समर्पण – सफलता पाने के लिए करम में रूचि होना अत्यंत आवश्यक है | जो लोग केवल इच्छा करते हैं किंतु उसके लिए कुछ करना नहीं चाहते, वे खयाली पुलाव पकाना चाहते हैं | उसका जीवन असफल होता है | सफल होने की लिए कर्म के प्रति पूरा समर्पण होना चाहिए | जयशंकर प्रसाद ने लिखा है –

ज्ञान दुर्कुछ्किर्य भिन्न है 
इच्छा क्यों पूरी हो मन की |
एक-दुसरे से न मिल सकें 
यही विडंबना है जीवन की ||

कठिनाईयों के बीच मार्ग-निर्माण – कर्म के प्रति समर्पित लोग रास्ते की कठिनाईयों से नहीं घबराया करते | कविकर खंडेलवाल के शब्दों में – 

जब नाव जल में छोड़ दी 
तूफान ही में मोड़ दी 
दे दी चुनौती सिंधु को 
फिर पार क्या, मँझधार क्या !

वास्तव में रस्ते की कठिनाइयाँ मनुष्य को चुनौती देती हैं | वे युवकों के पौरुष को ललकारती हैं | उसी में से कर्मवीरों को काम पूरा करने की प्रेरणा मिलती है | इसलिए कठिनाईयों को मार्ग-निर्माण का साधन माना चाहिए |

कोई उदाहरण, सूक्ति – देश को स्वतंत्रता कैसे मिली ? गाँधी जी ने सत्याग्रह का प्रयोग क्यों किया ? अंग्रेजी अनुसार सत्य और अहिंसा के पथ पर रहते हुए विरोध किया | अंग्रेजों की डिग्रियाँ फाड़ डालीं | भारत में आकर नमक कानून तोड़ा | भारत छोड़ों आंदोलन चलाया | परिणाम यह हुआ कि सारा भारत जाग उठा | एक दिन 

भारत स्वतंत्र हो गया | एक गईं की पंक्ति है –
तू चल पड़ा तो चल पड़ेगी साथ सारी भारती |
निष्कर्ष, प्रेरणा – इस कहावत से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि प्रबल इच्छा को मन में धारण करो | वह इच्छा शक्ति अपने-आप रास्ते तलाश लेगी | इच्छा शक्ति वह ज्वालामुखी है जो पहाड़ों की छाती फोड़कर भी प्रकट हो जाती है |




सत्संगति सब विधि हितकारी 
सत्संगति का अभिप्राय – सत्संगति का आशय है – अच्छी संगति, अच्छा साथ, भले साथी | संगति घर से ही आरंभ हो जाती है | यदि घर के सदस्य भले हैं सत्संगति घर से ही आरंभ हो जाती है | घर के बाहर व्यक्ति जिन भले लोगों के बीच में उठता-बैठता है, उसे सत्संगति करते हैं |
सुसंगति और कुसंगति के अच्छे-बुरे परिणाम – सत्संगति हो या कुसंगति-दोनों का प्रभाव अवश्य होता है | सत्संगति से मनुष्य अच्छे मार्ग पर चलता है | उसकी सुख प्रवृतियाँ जाग्रत होती हैं | उसके देवता जाग्रत होते हैं | वह अच्छे विचार और व्यवहार को देख-देखकर अच्छा आचरण करता है | इसके विपरीत कुसंगति से मनुष्य की राक्षसी प्रवुर्तियाँ जाग्रत हो उठती हैं | वह विलासी, अहंकारी तथा स्वेच्छाचारी बनने लगता है | सिगरेट, शराब, जुआ, आवारागर्दी कुंसंगती से ही बढ़ते हैं |
सत्संगति हितकारी कैसे ? – मनुष्य अच्छे लोगों में रहकर अच्छा आचरण करता है | वह सत्पुरुषों में अपना मान-सम्मान बढ़ाना चाहता है | भगतसिंह क्रांतिकारियों के संपर्क में आए तो क्रांतिकारी बन गए | यदि वे आवारा-बदचलन साथियों के बीच रहते तो शायद वैसे ही ढल गए होते | इस प्रकार सत्संगति ने उसके जीवन की दिशा बदल डाली | वे भारतवर्ष के चहेते बन गए | लोग उन्हें अब भी बलिदानी और क्रांतिकारी वीर के रूप में याद करते हैं |
सुसंगति की प्राप्ति और कुसंगति को छोड़ने के उपाय – मनुष्य मूलत: पशु है | इसलिए वह पशु-प्रवुर्तियों की ओर अधिक आसानी से झुकता है | कुसंगति में पाँव रखना बहुत सरल होता है किंतु उससे पीछा छुड़ाना बहुत कठिन होता है | मनुष्य की दृढ़ इच्छा-शक्ति ही उसे कुसंगति से बचा सकती है | बार-बार अपने मन को समझने से, विवेक से, अच्छे-बुरे की पहचान से ही कुसंगति से दूर रहा जा सकता है | किंतु जिसके लिए राम और रावण दोनों समान हैं, उसके लिए कीचड़ और कमल भी समान होते हैं | ऐसे लोग कुसंगति में पड़े रहते हैं | जिसे कमल की श्रेष्ठता का बोध होगा, वाही कीचड़ के बीच रहकर भी कमल जैसा खिल सकेगा | परंतु केवल बोध भी प्रभावी नहीं होता | दृढ़ इच्छाशक्ति आवश्यक होती है | यह इच्छाशक्ति प्रभु-कृपा से प्राप्त होती है | जिसके मन में सत्संगति की इच्छा नहीं होती, वह अभागा होता है | दुर्योधन कहता है – ‘मुझे पता है कि धर्म-अधर्म किया है ? परंतु क्या करूँ-धर्म ओर मेरी प्रवुर्ती नहीं है |’
सुसंगति सब सुखों का मूल – सत्संगति से सब प्रकारक के सुख प्राप्त होते हैं | अच्छी संगति में रहने वाला-मनुष्य पाप-बोध से रहित होता है | उसकी आत्मा स्वच्छ होती है | इसलिए उसके चेहरे पर दुःख, पश्चाताप, निराशा, अदि दुर्भाव नहीं होते | वह सदा अताम्विश्वास और उल्लास से खिल-खिला रहता है |



दया धर्म का मूल है 

तुलसीदास का दोहा – गोस्वामी तुलसीदास का प्रशिद्ध बचन है – 

दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान |
तुलसी दया न छोड़िये जा घट तन में प्राण ||

इस कथन से स्पष्ट होता है कि धर्म का मूल है – दया या करुणा | दया भाव से हिम्नुश्य का मन द्रवित होता है | किसी दुखी को देखकर उसका दुश दूर करने की कोशिश करना ही धर्म है | वास्तव में करुणा ईश्वरीय गुण है | भगवान कृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है – जब जब धरा पर धर्म की हानि और अधर्म की अधिकता होती है, तब-तब में अवतार धारण करता हूँ | धरम की रक्षा के लिए स्वयं धरती पर जन्म लेना भगवन की करुणा ही है |
करुणा से महानता की ओर – संसार में जितने भी महान इन्सान हुए हैं, सबके जीवन में करूणा का अंग अवश्य रहा है | भगवान बुद्ध ने राजपाट छोड़कर दुखी लोगों के दुःख दूर करने में अपना जीवन लगा दिया | नानक ने संसारिकता त्यागकर ही महानता अर्जित की | गाँधी जी ने अपनी वकालत त्यागकर देशवासियों के लिए कर्म किया, तभी सारे देश ने उन्हें अपना बापू माना | वास्तव में जब भी कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जनहित का आचरण करता है, वह हमारे लिए पूज्य बन जाता है |

करूणा निस्वार्थ होती है – करुणा सात्विक भाव है | करूणा न तो अपने-पराए का भेदभाव देखती है, और न ही अपनी हनी की परवाह करती है | करूणा में अदभुत प्रेरणा होती है | दयावान किसी को कष्ट में देखकर चुपचाप नहीं बैठ सकता | उनकी आत्मा उसे मज़बूर करती है कि दयावान दया करने से पहले अपना हानि-लाभ निश्चित करे | यहाँ तक कि वह किसी के प्राण बचाकर भी उसके बदले उससे कुछ नहीं चाहता | दया निस्वार्थ ही होती है |
एक प्रसिद्ध सूक्ति है – “नेकी कर कुएँ में डाल |” यह सूक्ति करूणा की ही व्याख्या करती है, वही उसका उचित मूल्य है |
करूणा रक्षा में सहायक है – भगवान ने करूणा की भावना मनुष्य को इसलिए दी है ताकि यस संसार बना रहे | अगर कोई राक्षस किसी बेकसूर को मारे, या किसी की रोटी छीने तो यह करूणा आदमी को प्रेरणा देती है कि बेकसूर की रक्षा हो | न्याय की रक्षा करना धर्म है |



जब आवै संतोष धन, सब धन धुरि समान 

तृष्णा का दुःख – महात्मा गाँधी लिखते हैं – “यह वसुंधरा अपने सारे पुत्रों को धन-धन्य दे सकती है, किंतु ‘एक’ भी व्यक्ति की तृष्णा को पूरा नहीं कर सकती |” यह पंक्ति अत्यंत मार्मिक है | इसे पढ़कर यह रहस्य उद्घाटिल होता है कि मनुष्य का असंतोष उसकी समस्याओंका मूल है | उसकी प्यास कभी शांत नहीं होती |

दुःख का कारण – वासनाएँ – मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक विविध वस्तुओं के पीछे पागल हुआ घूमता है | कभी उसे खिलौने चाहिए, कभी खेल, कभी धन चाहिए, कभी यश, कभी कुर्सी चाहिए, कभी पद | इक सबके आकर्षण का कारण है – इसकी प्यास | मनुष्य इस प्यास को त्याग नहीं सकता | इस प्यास के मारे वह जीवन-भर इनकी गुलामी सहन करने को तैयार हो जाता है | वास्तव में उसकी गुलामी का कारण उसका अज्ञान है | उसे पता ही नहीं है कि वस्तुओं में रस नहीं है, अपितु इच्छा और इच्छा-पूर्ति में रस है | जिस दिन उसे अपाने इस मनोविज्ञान का बोध हो जाएगा, तब भी उससे यह गुलामी छोड़ी नहीं जा सकेगी, क्योंकि इच्छाएँ अभुक्त वेश्याएँ हैं जो मनुष्य को पूरी तरह पि डालती हैं और फिर भी जवान बनी रहती हैं |

वासनाओं का समाधान – इस प्रश्न का उत्तर गीता में दिया गया है – ज्ञान, वैराग्य और अभ्यास से मन की वासनाओं को शांत क्या जा सकता है | जब वस्तुएँ व्यर्थ हैं तो उन्हें छोड़ना सीखें | सांसारिक पदार्थ जड़ हैं, नश्वर हैं तो उनकी जगह चेतक जगत को अपनाना सीखें | परमात्मा का ध्यान करें | मन बार-बार संसार की और जाए तो साधनापुर्वक, अभ्यासपूर्वक उसे परमात्मा की ओर लगाएँ | इन्हीं उपायों से मन में संतोष आ सकता है | संतोष से स्थिरता आती है और स्थिरता से आनंद मिलता है | वास्तविक आनंद भी वही है जो स्थिर हो, चंचल ण हो | सांसारिक सुख चंचल हैं, जबकि त्यागमय आनंद स्थायी हैं | अतः यह सच है कि ‘ जब आवै संतोष धन, सब धन धुरि समान |’


Saturday, December 17, 2016


मन के हारे हार है, मन के जीते जीत 

मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति : मन – मानव की सबसे बड़ी शक्ति ‘मन’ है | मनुष्य के पास मन है, इसलिए वह मनुष है, मनुज है, मानव है | मानसिक बाले पर ही मनुष ने आज तक की यह सभ्यता विकसित की है | मन मनुष्य को सदा किसी-न-किसी कर्म में रत रखता है |

मन के दो पक्ष : आशा-निराशा – धुप-छाँव के समान मनव-मन के दो रूप हैं – आशा-निराशा | जब मन में शक्ति, तेज और उत्साह ठाठें मारता है तो आशा का जन्म होता है | इसी के बल पर मनुष्य हज़ारों विपतियों में भी हँसता-मुस्कराता रहता है |

निराश मन वाला व्यक्ति सारे साधनों से युक्त होता हुआ भी युद्ध हर बैठता है | पांडव जंगलों की धुल फाँकते हुए भी जीते और कौरव राजसी शक्ति के होते हुए भी हारे | अतः जीवन में विजयी होना है तो मन को शक्तिशाली बनाओ |

मन को विजय का अर्थ – मन की विजय का तात्पर्य है – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे शत्रुओं पर विजय | जो व्यक्ति इनके वश में नहीं होता, बल्कि इन्हें वश में रखता है, वह पुरे विश्व पर शासन कर सकता है | स्वामी शंकराचार्य लिखते हैं – “जिसने मन जो जीत लिया उसने जगत को जीत लिया |”

मन पर विजय पाने का मार्ग – गीता में मन पर नियंत्रण करने के दो उपाय बाते गए हैं – अभ्यास और वैराग्य | यदि व्यक्ति रोज़-रोज़ त्याग या मोह-मुक्ति का अभ्यास करता रहे तो उसके जीवन में असीम बल बल आ सकता है |

मानसिक विजय ही वास्तविक वियज – भारतवर्ष ने विश्व को अपने मानसिक बल से जीता है, सैन्य-बल से नहीं | यही सच्ची विजय भी है | भारत में आक्रमणकारी शताब्दियों तक लड़-जीत कर भी भारत को अपना न बना सके, क्योंकि उनके पास नैतिक बल नहीं था | शरीर-बल से हारा हुआ शत्रु फिर-फिर आक्रमण करने आता है, परंतु मानसिक बल से परास्त हुआ शत्रु स्वयं-इच्छा से चरणों में लोटता है | इसीलिए हम प्रभु से य्ह्ही प्राथना करते हैं – मानसिक बल से परस्त हुआ शत्रु स्वयं-इच्छा से चरणों में लोटता है | इसीलिए हम प्रभु से यही प्रार्थना करते हैं – 

हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें |
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें ||



पराधीन को सुख नहीं 

पराधीनता का आशय – पराधीनता का आशय है – दुसरे के अधीन | अधीनता बहुत बड़ा दुःख है | हर आदमी स्वतंत्र रहना चाहता है | यहाँ तक कि सोने के पिंजरे में बंद पक्षी भी राजमहल के सुखों और स्वादिष्ट भोगों को छोड़कर खुले आकाश में उड़ जाना चाहता है |

स्वतंत्रता : जन्मसिद्ध अधिकार – प्रत्येक बच्चा सवतंत्र पैदा होता है | किसी मनुष्य, देश, समाज या राष्ट्र को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति, देश समूह या राष्ट्र को बलपूर्वक अपने अधीन करे | आज विश्व के अधिकांश संविधान यह स्वीकार कर चिके हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता का अधिकार है |
मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है –

अधिकार खोकर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है |
न्यायार्थ अपने बंधू को भी दंड देना धर्म है |

पराधीनता की हानियाँ – पराधीन व्यक्ति जीवित होते हुए भी मृत के समान होता है | वह दासों के समान परायी और बसी ज़िंदगी जीता है | वह सदा अपने मालिक की और टुकर-टुकर निहारता है | हितोपदेश में कहा गया है – “जो प्रधीन्होने पर भी जीते हैं तो मरे हुए कौन हैं ?”

पराधीनता के प्रकार – पराधीन केवल बही नहीं होता, जिसके पैरों में बेड़ियाँ हों या चारों और दीवारों का घेरे हो | वह व्यक्ति भी पराधीन होता हिया जिसका मन गुलाम है | जैसे अंग्रेजों ने भारतियों को आज़ाद कर दिया, परंतु अनके भारतियों के मन अब भी अंग्रेजों के गुलाम हैं | जैसे अंग्रेजों ने भारतियों को आज़ाद कर दिया, परंतु अनके भारतियों के मन अब भी अंग्रेज़ों के गुलाम हैं | वे आज भी अंग्रेज़ीदां होने में गर्व अनुभव करते हैं | भला ‘निज संस्कुती’ से उखड़े हुए ऐसे लोगों को स्वाधीन या स्वतंत्र कैसे कहें ?

आर्थिक पराधीनता – पराधीनता का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रकार है – अधिक पराधीनता | गरीब देशों को न चाहते हुए भी अपने ऋणदाता देशों की कुछ गलत बारें माननी पड़ती हैं | अतः यदि भारतवासियों को आज़ादी का सुख भोगना है तो उन्हें पराधीनता की हर बेड़ी को तोड़ना होगा |



विपति कसौटी जो कसे सोई साँचे मीत
अथवा
मित्रता बड़ा अनमोल रत्न

जीवन की सरसता के लिए मित्र की आवश्यकता – ‘मित्रता’ का तात्पर्य है – किसी के दुःख-सुख का सच्चा साथी होना | सच्चे मित्रों में कोई दुराव-छिपाव नहीं होता | वे निश्छल भाव से अपना सुख-दुख दुसरे को कह सकते हैं | उनमें आपसी विश्वास होता है | विश्वास के कारण ही वे अपना ह्रदय दुसरे के सामने खोल पाते हैं |
मित्रता शक्तिवर्धक औषधि के समान है | मित्रता में नीरस से कम भी आसानी से हो जाते हैं | दो मित्र मिलकर दो से ग्यारह हो जाते है |

जीवन-संग्राम में मित्र महत्वपूर्ण – मनुष्य को अपनी ज़िंदगी के दुःख बाँटने के लिए कोई सहारा चाहिए | मित्रता ही ऐसा सहारा है | एडिसन महोदय लिखते हैं – ‘मित्रता ख़ुशी को दूना करके और दुःख को बाँटकर प्रसन्नता बढ़ाती है तथा मुसीबत कम करती है |’

सच्चे मित्र की परख और चुनाव – विद्वानों का कहना है कि अचानक बनी मित्रता से सोच-समझकर की गई मित्रता अधिक ठीक है | मित्र को पहचानने में जल्दी नहीं करनी चाहिए | यह काम धीरे-धीरे धर्यपूर्वक कारण चाहिए | सुकरात का बचन है- ‘ मित्रता करके में शीघ्रता मत करो, परंतु करो तो अंत तक निभाओ |’
मित्रता समान उम्र के, समान स्तर के, समान रूचि के लोगों में अधिक गहरी होती है | जहाँ स्तर में असमानता होगी, वहाँ छोटे-बड़े का भेद होना शुरू हो जाएगा |

सच्ची मित्र वाही है जो हमें कुमार्ग की और जाने से रोके तथा सन्मार्ग की प्रेरणा दे | सच्चा मित्र चापलूसी नहीं करता | मित्र के अवगुणों प्र पर्दा भी नहीं डालता | वह कुशलता-पूर्वक मित्र को उसके अवगुणों से सावधान करता है | उसे सन्मार्ग पर चलने में सहयोग देता है |

सच्चा मित्र मिलना सौभाग्य की बात – यह सत्य है कि सच्चा मित्र हर किसी को नहीं मिलता | विश्वासपात्र मित्र एक खजाना हैजो किसी-किसी को ही मिलता है | अधिकतर लोग तो परिचितों की भीड़ में अकेले रहते हैं | दख-सुख में उनका कोई साठी नहीं होता | जिस किसी को अपना एक सह्रदय मित्र मिल जाए, वह स्वयंक को सौभाग्यशाली समझे |





परोपकार


परोपकार का महत्व – परोपकार अर्थात् दूसरों के काम आना इस सृष्टि के लिए अनिवार्य है | वृक्ष अपने लिए नहीं, औरों के लियेफल धारण करते हैं | नदियाँ भी पाना जल स्वयं नहीं पीतीं | परोपकारी मनुष्य संपति का संचय भी औरों के कल्याण के लिए करते हैं | साडी प्रकुर्ती निस्वार्थ समपर्ण का संदेश देती है | सूरज आता है, रोशनी देकर चला जाता है | चंद्रमा भी हमसे कुछ नहीं लेता, केवल देता ही देता है | कविवर पंत के शब्दों में – 

हँसमुख प्रसून सिखलाते 
पलभर है, जो हँस पाओ |
अपने उर की सौरभ से 
जग का आँगन भर जाओ ||


परोपकार से प्राप्त आलौकिक सुख – परोपकार का सुख लौकिक नहीं, अलौकिक है | जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से किसी छायल की सेवा करता है तो उस क्षण उसे पाने देवत्व के दर्शन होते हैं | वह मनुष्य नहीं, दीनदयालु के पद पर पहुँच जाता है | वह दिव्य सुख प्राप्त करता है | उस सुख की तुलना में धन-दौलत कुछ भी नहीं है | 

परोपकार के विविध उदाहरन – भारत में परोपकारी महापुरषों की कमी नहीं है | यहाँ दधीची जैसे ऋषि हुए जिन्होंने अपने जाति के लिए अपने शरीरी की हड्डियाँ दान में दे दीं | यहाँ सुभाष जैसे महँ नेता हुए जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना तन-मन-धन और सरकारी नौकरी छोड़ दी | बुद्ध, महावीर, अशोक, गाँधी, अरविंद जैसे महापुरषों के जीवन परोपकार के कारण ही महान बन सके हैं |

परोपकार में ही जीवन की सार्थकता – परोपकार दिखने में घाटे का सौदा लगता है | परंतु वास्तव में हर तरह से लाभकारी है | महात्मा गाँधी को परोपकार करने से जो गौरव और समान मिला ; भगत सिंह को फाँसी पर चढ़ने से जो आदर मिला ; बुद्ध को राजपाट छोड़ने से जो ख्याति मिली, क्या वह एक भोगी राजा बन्ने से मिल सकती थी ? कदापि नहीं | परोपकारी व्यक्ति सदा प्रसन्न, निर्मल और हँसमुख रहता है | उसे पश्चाताप या तृष्णा की आग नहीं झुलसाती | परोपकारी व्यक्ति पूजा के योग्य हो जाता है | उसके जीवन की सुगंध सब और व्याप्त हो जाती है | अतः मनुष्य को चाहिए की वह परोपकार को जीवन में धारण करें | यही हमारा धर्म है |


Wednesday, December 07, 2016


समय का सदुपयोग

समय जीवन है – फैंकलिन का प्रशिद्ध कथन है –‘वकत को बरबाद न करो कियोंकि जीवन इसी से बना है |’ समय ही जीवन है | जीवन क्या है – जीने का कुछ वक्त | मृत्यु के बाद तो समय का कोई अर्थ नहीं रह जाता | अतः समय सबसे मूल्यवान है |

समय का सदुपयोग – समय का सदुपयोग यही है कि प्रत्येक कार्य निच्चत समय पर कर दिया जाए | उचित घडी बीत जाने पर किया गया कार्य निष्फल होता है | गोस्वामी तुलसीदास लिखते है –
का बरषा जब कृषि सुखाने | समय चुकि पुनि का पछिताने

उचित समय की अग्रिम प्रतीक्षा करनी पड़ती है | समय की अपेक्षा करने वाले को समय का रथ बुरी तरह रौंद डालता है | शेक्सपीयर का कथन है – “ मैंने समय को नष्ट किया और अब समय मुझे नष्ट कर रहा है |’

समय की पाबंदी – समय के प्रति सचेत तथा गंभीर रहना समय का सबसे बड़ा सम्मान है | समय के पाबंद रहकर समय की बचत की जा सकती है | यदि सारी रेलगाड़ियाँ समय पर छुटें और समय से पहुँचे ; सारे उत्सव-त्योहार ठिक समय पर प्रारंभ होकर ठिक समय पर समाप्त हों और सभी कार्य निश्चित समय पर हों, तो सभी मनुष्यों का समय बाख सकता है | राष्ट्रपिता गाँधी जी समय के पाबंद थे | वे एक मिनट की देरी को भी देरी मानते थे |

सफलता में समय की भूमिका – जीवन में सफलता पाने के लिए समय की अनुकूलता का होना | आवश्यक है | यदि संयु अनुकूल न हो तो मनुष्य के सरे प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं | पढ़ाई के वक्त पढ़ाई, खेल के समय खेल, शादी के समय मौज़ और गृहस्थी के समे ज़िम्मेदारी – ये सब वकत पर ही अच्छे लगते हैं | जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता, वह वकत के थपेड़े खाता रहता है |



श्रम का महत्व 

संसार में आज जो भी ज्ञान-विज्ञान की उन्नति और विकास है, उसका कारण है परिश्रम – मनुष्य परिश्रम के सहारे ही जंगली अवस्था से वर्तमान विकसित अवस्था तक पहुँचा है | उसके श्रम से खेती की | अन्न उपजाया | वस्त्र बनाए | घर, मकान, भवन, बाँध, पुल, सड़कें बनाई | पहाड़ों की छाती चीरकर सड़कें बनाने, समुद्र के भीतर सुरंगें खोदने, धरती के गर्भ से खनिज-तेल निक्कालने, आकाश की ऊचाइयों में उड़ने में मनुष्य ने बहुत परिश्रम किया है |

परिश्रम करने में बुद्धि और विवेक आवश्यक – परिश्रम केवल शरीर की किर्याओं का ही नाम नहीं है | मन तथा बुद्धि से किया गया परिश्रम भी परिश्रम कहलाता है | एक निर्देशक, लेखक, विचारक, वैज्ञानिक केवल विचारों, सलाहों, और यक्तियों को खोजकर नवीन अविष्कार करता है | उसका यह बोद्धिक श्रम भी परिश्रम कहलाता है |
परिश्रम से मिलने वाले लाभ – परिश्रम का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता मिलती है | दुसरे, परिश्रम करने वाला मनुष्य सदा सुखी रहता है | उसे मन-ही-मन प्रसन्नता रहती है कि उसने जो भी भोगा, उसके बदले उसने कुछ कर्म भी किया | महात्मा गाँधी का यह विश्वाश था कि “जो अपने हिस्से का काम किए बिना ही भोजन पाते हैं, वे चोर हैं |”

परिश्रमी व्यक्ति का जीवन स्वाभिमान से पूर्ण होता है, जबकि एय्याश दूसरों पर निर्भर तथा परजीवी होता है जबकि विलासी जन सदा भाग्य के भरोसे जीते हैं तथा दूसरों का मुँह ताकते हैं |

उपसंहार – वेदवाणी में कहा गया है – “ बैठने वाले का भाग्य भी बैठ जाता है और खड़े होने वाले का भाग्य भी खड़ा हो जाता है | इसी प्रकार सोने वैल का भाग्य भी सो जाता है और पुरुषार्थी का भाग्य भी गतिशील हो जाता है | चले चलो, चले चलो |” इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने सोई हुई भारतीय जनता को कहा था – ‘उठो’, जागो और लक्ष्य-प्राप्ति तक मत रुको |’




चरित्र-बल 

चरित्र एक महाशक्ति – बर्टल लिखते हैं – ‘चरित्र एक एसा हीरा है, जो हर किसी पत्थर को घिस सकता है |’ चरित्र केवल शक्ति ही नहीं, सब शक्तियों पर छा जाने वाली महाशक्ति है | जिसके पास चरित्र रूपी धन होता है, उसके सामने संसार-भर की विभूतियाँ, संपतियाँ और सुख-सुविधाएँ घुटने टेक देती हैं |

चरित्र पर सर्वस्व सम्पूर्ण – राणा के चरित्र पर भामाशाह का धन भी समप्रित हो गया | सुभाष के चरित्र को देखकर असंख्य युवकों-युवतियों ने धन, संपति, खून -  यहाँ तक कि अपना पूरा जीवन तक होम कर दिया | मुट्ठी भर हड्डियों वाले बापू पर विश्व की कौन-सी संपति कुर्बान नहीं थी ? संतों-महात्माओं को जितना धन-यश, वैभव और भक्ति मिलती है, उसका एक अल्पांश भी बड़े-बड़े धन्नासेठों को नहीं मिलता | चरित्र तो सब शक्तियों का बादशाह है |

चरित्र जा जन्म – चरित्र जन्मजात गुणों और आदान से ढाले गए व्यवहार को मिलकर बनता है | गाँधीजी का उदहारण सामने है | वे प्रितिभा में अत्यंत सामान्य थे | परंतु उन्होंने सत्य, अहिंसा और न्याय के जो गुण अपने जीवन में ढाले, उसी के परिणामस्वरुप उन्हें ऐसा उज्जवल चरित्र मिला जिससे सारे विश्व को प्रकाश प्राप्त हुआ | इसीलिए बोर्डमैन लिखते हैं –

“कर्म को बोओ और आदाल की फसल काटो ; आदत को बोओ और चरित्र की फसल काटो ; चरित्र को बोओ और भाग्य की फसल काटो |”

चरित्र साधना है | इसे अपने ही प्रयास से पैसा किया जा सकता है | इसका तरीका भी बहुत सरल है – सद्गुणों पर चलना, अवगुणों से बचना | प्रेम, त्याग, करुणा, मानवता, अहिंसा को अपनाना तथा लोभ, मोह, निंदा, उग्रता, क्रोध, अहंकार को छोड़ना | परंतु यह सरल-सा मार्ग ही साधना के बिना बहुत कठिन हो जाता है |

चरित्र-बल के लाभ- चरित्रवान व्यक्ति स्वयं को धन्य अनुभव करता है | उसे पाना जीवन सफल प्रतीत होता है | संसार की सारी खुशियाँ उसके चरों और घुमती हैं | उसके चरों और आशा और उत्साह का ऐसा प्रकाश-मंडल घिर आता है कि संसार के कष्ट भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते | चरित्रवान व्यक्ति को मिले काँटे भी फुल बन जाते हैं | अपमान भी सम्मान बन जाते हैं, जेल के सींखचे उसके लिए मंदिर बन जाते हैं, विष के प्याले अमृत बन जाते हैं |




वन और हमरा पर्यावरण 

वन और पर्यावरण – वन और पर्यावरण का गहरा संबंद है | ये सचमुच जीवनदायक हैं | ये वर्षा लाने में सहायक होते हैं और धरती की उपजाऊ-शक्ति को बढ़ाते हैं | वन ही वर्षा के धारासार जल को अपने भीतर सोखकर बाढ़ का खतरा रोकते हैं | यही रुका हुआ जल धीरे-धीरे सरे पर्यावरण में पुन: चला जाता है | वनों की कृपा से ही भूमि का कटाव रुकता है | सुखा कम पड़ता है तथा रोगिस्तान का फैलाव रुकता है |

प्रदूषण-निवारण में सहायक – आज हमारे जीवन की सबसे बड़ी समस्या है – पर्यावरण-प्रदूषण | कार्बन डाइआक्साइड, गंदा, धुआँ, कर्णभेदी आवाज, दूषित जल-इन सबका अचूक उपय है – वन सरंक्षण | वन हमारे द्वारा छोड़ी गई गंद साँसों को, कार्बन डाइआक्साइड को भोजन के रूप में ले लेते हैं और बदले में हमें जीवनदायी आक्सीजन प्रदान करते हैं | इन्ही जंगलों में असंख्य, अलभ्य जीव-जंतु निवास करते हैं जिनकी कृपा से प्राकृतिक संतुलन बना रहता है | आज शहरों में उचित अनुपात में पेड़ लगा दिए जाएँ तो प्रदूषण की भयंकर समस्या का समाधान हो सकता है | परमाणु ऊर्जा के खतरे को तथा अत्यधिक ताप को रोकने का सशक्त उपय भी वनों के पास है |

वनों की अन्य उपयोगता – वन ही नदियों, झरनों और अन्य प्राकुतिक जल-स्रोतों के भंडार हैं | इनमें ऐसी दुर्लभ वनस्पतियाँ सुरक्षित रहती हैं जो सारे जग को स्वास्थ्य प्रदान करती हैं | गंगा-जल की पवित्रता का कारण उसमें मिल्ली वन्य औषधियाँ ही हैं | इसके अरिरिक्त वन हमें, लकड़ी, फुल-पट्टी, खाद्द-पदार्थ, गेंद तथा अन्य सामन प्रदान करते हैं |

वन-सरंक्षण की आवश्यकता – दुर्भाग्य से आज भारतवर्ष में केवल 23 % वन रह गए हैं | अंधाधुंध कटाई के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है | वनों का संतुलन बनाए रखने के लिए 10% और अधिक वनों की आवश्यकता है | जैसे-जैसे उद्दोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, वाहन बढ़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे वनों की आवश्यकता और अधिक बढ़ती जाएगी |



विज्ञापन और हमारा जीवन 

विज्ञापन का उद्देश्य – किसी वास्तु, विचार, क्रायक्रम या संदेश के प्रचार-प्रसार के लिए जो साधन-सामग्री प्रयोग में लायी जाती है, उसे विज्ञापन कहते हैं | विज्ञापन का उद्देश्य संबंधित वास्तु या संदेश को दूर-दूर तक फैलाना होता है |

विज्ञापनों के विविध प्रकार – विज्ञापनों के अनेक प्रकार होते हैं | सामाजिक विज्ञापनों के अंतर्गत दहेज, नशा, परिवार-नियोजन आदि संदेश आते हैं | विभिन्न कार्यक्रमों, रैलियों, आंदोलनों के विज्ञापन भी इसके अंतर्गत आते हैं | कुछ विज्ञापन विवाह, नौकरी, संपति की खरीद-बेच संबंदी होते हैं | सबसे लोकप्रिय और लुभावने विज्ञापन होते हैं – व्यापारिक विज्ञापन | व्यापारी और अद्दोग्पति अपने माल को दूर दूर तक बेचने के लिए अत्यंत आकषर्क विज्ञापनों का प्रयोग करते हैं |

निर्णय को प्रभावित करने में विज्ञापनों को भूमिका – मनुष्य कौन-सा माल खरीदे-इसमें विज्ञापनों की भूमिका सबसे बड़ी होती है | कोई भी व्यक्ति दुकान पर खड़ा होकर विविध वस्तुओं में से प्रसिद्ध वस्तुओं कोही चुन पाता है | चाहे बाजार में कितने भी श्रेष्ठ साबुन उपलब्ध हों, किंतु ग्राहक उन्हीं को खरीदता है जिसका उनसे विज्ञापन सुना है | जब मनुष्य भुत साडी विविधताओं में फँस जाता है तो विज्ञापन ही निर्णय करने में सहायक होते हैं |

विज्ञापनों का सामाजिक दायित्व – विज्ञापन प्रभावकारी होते हैं | इसलिए उनका सामाजिक दायित्व भी बहुत बड़ा होता है | प्राय: माल बेचने के लिए भ्रामक विज्ञापन दिए जाते हैं | गलत तथा दूषित माल बेचने के लिए भी आकर्षक सितारों का उपयोग किया जाता है | पीछे शाहरुख़ खान से खा गया कि वे कोका कोला या पेप्सी आदि हानिकारक पेयों का विज्ञापन ण करें | परंतू उन्होंनें पैसे लेलोभ में इसकी जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी | वास्तव में विज्ञापन से जुड़े हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वे भ्रामक विज्ञापन न छापें | इससे समाज में गलत वस्तुओं और संदेशों का प्रचार होता है |

निष्कर्ष – निष्कर्ष यह है कि विज्ञापनों में समाज की प्रभावित करने की अदभुत शक्ति है | ये सरकार, व्यापर तथा समाज के लिए वरदान हैं | परंतु गलत हाथों में पड़कर इसका दुरुपयोग भी हो सकता है | इस दुरुपयोग से बचा जाना चाहिए |






Friday, October 21, 2016



समाचार-पत्र : ज्ञान का सशक्त साधन 

समाचार-पत्र की आवश्यकता – मनुष्य स्वभाव से जिज्ञासु है | वह जिस समाज में रहता है, उसकी पूरी जानकारी चाहता है | इस बहाने वह शेष दुनिया से जुड़ता है | इसी प्रवृति के कारण ही समाचार-पत्र का उदय हुआ |
इतिहास – भारत में पहला समाचार-पत्र ‘इंडिया गजट’ नाम से प्रकाशित हुआ | हिंदी का सवर्प्रथम समाचार-पत्र ‘उदंत मार्तड’ कोलकाता से प्रकाशित हुआ | आज हिंदी-अंग्रेजी के सैकड़ों समाचार-पत्र निकल रहे हैं | इनमें से प्रमुख हैं – हिंदुस्तान, हिंदुस्तान टाइम्स, ट्रिब्यून, स्टेट्समैन, टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक जागरण, जनसता, पंजाब केसरी, अमृत बाज़ार पत्रिका, पायोनियर, इंडियन एक्सप्रेस आदि |
विश्व-भर से जोड़ने का साधन – समाचार-पत्र मनुष्य को विश्व-भर से जोड़ता है | प्रात: होते ही सारे संसार महत्वपूर्ण जानकारियाँ समाचार-पत्र द्वारा उपलब्ध हो जाती हैं | इसलिए जेम्स एलिस ने कहा था – “समाचार-पत्र संसार के दर्पण हैं |”
लोकतंत्र का प्रहरी - समाचार-पत्र लोकतंत्र का सजग प्रहरी है | लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि जनता सब कुछ जाते और अपनी इच्छा-अनिच्छा को प्रकट करे | नपोलियन खा करता था – “ मैं लाखों संगीनों की अपेक्षा तीन विरोधी समाचार-पत्रों से अधिक डरता हूँ |”
जनमत बनाने का साधन – ‘समाचार-पत्र साधारण जनता के शिक्षक हैं |’ समाचार-पत्रों के संपादक, संवाददाता या अन्य अधिकारी जिस समाचार को जिस ढंग से देना चाहें, दे सकते हैं | आम जनता समाचार-पत्रों से सीधे प्रभावित होती है | विभिन्न समाज-सुधारक, चिंतक, विचारक, आंदोलन-कर्ता, क्रांतिकारी अपने विचारों को छापकर जनता को प्रभावित कर सकते हैं |
ज्ञान-वृद्धि का साधन – आजकल समाचार-पत्र पाठकों की ज्ञान-वृद्धि भी करते हैं | विशेष रूप रविवारीय पुष्ठों में छपी जानकारियाँ, नित्य नए अविष्कार, नए साधन, नए पाठ्यक्रमों की जानकारी, अदभुत संसार की अदभुत जानकारियाँ पाठकों का ज्ञान बढ़ाती हैं | रोगों की जानकारी, उनके इलाज के उपाय भी समाचार-पत्र में छापे जाते हैं |
मनोरंजन का साधन – आजकल समाचार-पत्र पाठकों के लिए मनोरंजन की रंग-बिरंगी सामग्री लेकर उपस्थित होते हैं | खेल-संसार, फिल्मी संसार, चुटकले, कहानियाँ, पहेलियाँ, रंग-भरो प्रतियोगिता के माध्यम से बच्चे, किशोर और तरुण, भी समाचार-पत्रों पर जान छिड़कते हैं |
व्यापर के लाभ – समाचार-पत्रों से सर्वाधिक लाभ व्यापारियों, उद्योगितियों और फैक्ट्रियों को होता है | प्रचार और विज्ञापन के द्वारा इनका माल रातोंरात देशव्यापी बन जाता है | इसके माध्यम से आप अपनी संपति खरीद-बेच सकते हैं, सोना-चाँदी और शेयरों के दैनिक भाव जान सकते हैं | सचमुच समाचार-पत्र सांसारिक सिद्धियों का भंडार है | यस एसा शब्द-संसार है जिसमें पूरा संसार बसा है |



पर्यटन का महत्व

पर्यटन का आनंद – 

सैर कर दुनिया की गाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहाँ ?
जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहाँ ?

जीवन का असली आनंद घुमक्कड़ी में है ; मस्ती और मौज में है | प्रकृति के सौंदर्य का रसपान अपनी आँखों से उसके सामने उसकी गोद में बैठकर ही किया जा सकता है | उसके लिए आवश्यक है – पर्यटन |

पर्यटन के लाभ – पर्यटन का अर्थ है – घूमना | बस घुमने के लिए घूमना | आनंद-प्राप्ति और जिज्ञासा-पूर्ति के लिए घूमना | ऐसे पर्यटन में सुख ही सुख है | ऐसा पर्यटन दैनंदिन जीवन की भारी-भरकम चिंताओं से दूर होता है | जो व्यक्ति इस दशा में जितनी देर रहता है, उतनी देर तक वह आनंदमय जीवा जीता है |

पर्यटन का दूसरा लाभ है – देश विदेश की जानकारी | इससे हमारा ज्ञान समृद्ध होता है | पुस्तकीय ज्ञान उतना प्रभावी नहीं होता जितना कि प्रत्यक्ष ज्ञान | पर्यटन से हमें देश-विदेश के खान-पान, रहान-सहन तथा सभ्यता-संस्कृति की जानकारी मिलती है | इससे हमारे मन में बैठ हुए कुछ अंधविश्वाश टूटते हैं | हमें यह विश्वास होता है – विश्व – भर का मानव मूल रूप से एक है | हमारी आपसी दूरियाँ कम होती हैं | मन उदार बनता है | पूरा देश और विश्व अपना-सा प्रतीत होता है | राष्ट्रिय एकता बढ़ाने में पर्यटन का बहुत बड़ा योगदान है | 
पर्यटन : एक उद्दोग – वर्तमान समय में पर्यटन एक उद्दोग का रूप धारण कर चूका है  | हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर आदि पर्वतीय स्थलों की अर्थ-व्यवस्था पर्यटन पर आधारित है | वहाँ वर्षभर विश्व-भर से पर्यटक आते हैं और अपनी कमाई खर्च करते हैं | इससे ये पर्यटक-स्थल फलते-फूलते हैं | वहाँ के लोगों को आजीविका का साधन मिलता है |

पर्यटन के प्रकार – पर्यटन-स्थल अनेक प्रकार के हैं | कुछ प्रकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात हैं | जैसे-प्रसिद्ध पर्वत-चोटियाँ, समुद्र-तल, वन-उपवन | कुछ पर्यटन-स्थल धर्मित महत्व के हैं | जैसे हरिद्वार, वैष्णो देवी, काबा, कर्बला आदि | कुछ पर्यटन-स्थल एतेहासिक महत्व के हैं | जैसे लाल किला, ताजमहल आदि | कुछ पर्यटन-स्थल वज्ञानिक, सांस्कृतिक या अन्य महत्व रखते हैं | इनमें से प्राकृतिक सौंदर्य तथा धार्मिक महत्व के पर्यटन-स्थलों पर सर्वाधिक भीड़ रहती है |


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