Friday, September 23, 2016



भारतीय गाँव और महानगर 

नगर और गाँव की तुलना – भारतीय गाँव महानगर में वही संबंध होते है, जो सीधे-सादे बूढ़े बाप और उनकी अल्ट्रा माडर्न संतान में होता है | गाँव शहरों की सींचते हैं, उने धन, श्रम, माल देते है ; परंतु शहर फिर भी गाँव की और ताकते तक भी नहीं |

गाँव के सुख – भारत की अधिकांश जनता गाँव में रहकर  खेती करती है | गाँव में प्रकति का साथ रहता है | लंबे-चौड़े खेत, बाग़-बगीचे, कोयल की कुक, सर्दी-गर्मी-बरसात का पूरा आनंद ग्रामीण जीवन में ही लिया जा सकता है | प्रकति की गोद में प्रदुषण का नहीं, हरियाली, सवाच्छ्ता और सवास्थ का साम्राज्य रहता है |

गाँव के दुःख – दुर्भाग्य से आज गाँव में आभाव ही आभाव हैं | न सड़कें, न बिजली, न पानी, न आधुनिक वस्तुएँ | सब चीजों के लिए शहरों की और ताकना पड़ता है | डॉक्टरों के नाम पर नीम-हकीम या आर.एम.पी. ; सकूलों के नाम पर अनाथालय से विद्यालय, सफाई के नाम पर कूडे के ढेर, गोबर और कीच से लथपथ जिंदगी को देखकर सचमुच वहाँ रहने का मन नहीं करता |

महानगरों के सुख – महानगरों के पास सरे सुख-साधन तो हैं परंतु फिर भी यहाँ का आदमी सुखी नहीं है | यहाँ निरंतर संधर्ष, होड़, इर्षा, षड्यंत्र, दुर्घटना का बोलबाला है | यहाँ के सभी निवासी ऊँचे उठने योर उड़ने के लिए आतुर हैं | इसके लिए आपसी खींचतान और स्वार्थ का जमकर प्रदर्शन होआ है | महानगरों में रिश्तों के मधुर संबंध गायब हो गए हैं | च्कचोंध के मरे लोग आत्मीयता और सनेह का रस खो बैठे हैं |

प्रदषण – महानगरों में बढता हुआ प्रदषण और बढती हुई दुर्घटनाएँ और भी चिंता का कारण हैं | धुएँ, शोर और कृत्र्मिता के कारण महानगरों में खान-पान, रहन-सहन पवित्र नहीं रह गया है | रोज ढेर सारा धुआँ और पेट्रोल हमारी सांसों में चले जाता है | सड़कों पर भीड़ इतनी बढ़ गई है कि नित्य जानलेवा दुर्घटनाएँ बढ़ रही हैं |

निष्कर्ष – बास्तव में गाँव और महानगर – दोनों के अपने-अपने सुख और दुःख हैं | यदि गावों में महानगरों की सुख-सुविधाएँ बढ़ा दी जाएँ और महानगरों में गाँव की सहजता, सादगी, आत्मीयता उत्पन्न कर दी जाय तो दोनों जगहें आनंदमयी हो सकती हैं |


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